मेरा मन भी कितना पागल है,
ये मोह निरंतर करता है,
और सामने हो प्रभु, आप तो भी...
और सामने हो प्रभु, आप तो भी,
ना फिकर उसे, ना डरता है...
क्या कहूँ जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
जिनवर, जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
कैसे इसको सुलझाऊँ मैं,
और कैसे इसे जगाऊँ मैं,
करने है इसको राग और द्वेष...
करने है इसको राग और द्वेष,
एक पल भी ना ये समझता है...
क्या कहूँ जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
जिनवर, जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
तेरी राह पे चलना ज़रूरी है,
और व्यर्थ "झूठी" मजबूरी है,
ये बात का निर्णय जो मैं करूँ...
ये बात का निर्णय जो मैं करूँ,
फिर देखूँ मुझे क्या रोकता है...
क्या कहूँ जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
जिनवर, जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
मेरा मन भी कितना पागल है,
ये मोह निरंतर करता है,
और सामने हो प्रभु, आप तो भी...
और सामने हो प्रभु, आप तो भी,
ना फिकर उसे, ना डरता है...
क्या कहूँ जिनवर, ओ मेरे जिनवर...
जिनवर, जिनवर, ओ मेरे जिनवर...

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