स्वामी तुम हो मेरे मन में,
नदिया में और पवन में,
धरती पर और गगन में,
मेरे सारे जीवन में।
भक्ति प्रभु, चरणों में अर्पण है,
शत-शत बार, गुणों का कीर्तन है।
तुम ही मेरे दाता हो,
मुझे सच्ची राह दिखाते,
लाख बार जो पूछूं,
फिर भी मुझे सिखाते...
उपकार तुम्हारा ऐसा,
ना कभी चुका पाऊंगा,
दर पे तुम्हारे आकर,
बस शीश झुका पाऊंगा।
भक्ति प्रभु, चरणों में अर्पण है,
शत-शत बार, गुणों का कीर्तन है।
बतला दिया है तुमने,
सारा मार्ग स्पष्ट,
सभी प्रकार के कर्म,
मुझे हैं करने नष्ट...
पुरुषार्थ कठिन है लेकिन,
अवसर न फिर आएगा,
अज्ञान का घना अँधेरा,
जागृति से मिट पाएगा।
भक्ति प्रभु, चरणों में अर्पण है,
शत-शत बार, गुणों का कीर्तन है।
स्वामी तुम हो मेरे मन में,
नदिया में और पवन में,
धरती पर और गगन में,
मेरे सारे जीवन में।
भक्ति प्रभु, चरणों में अर्पण है,
शत-शत बार, गुणों का कीर्तन है।

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