मेरी दुकान एक दिन भी बंद रही, तो बहुत नुकसान हो जाता है। ज़िन्दगी रुक जाती है। जीना मुश्किल हो जाता है।ऐसा कहने वाला में १२ दिन से घर पर बैठा हूं, दुकान बंद है फिर भी ज़िन्दगी चल रही है। जीना भी ऐसा कोई खास मुश्किल नहीं है।ऊपर छत है, साथ में परिवार है, तीन वक़्त का खाना है, सुकून की नींद है।ऐसा शायद ज़िन्दगी भर नहीं चलेगा लेकिन जीवन में ऐसे कुछ दिन जब आयेगे तो खुशी से चल जाएगा।मुझे रुक नहीं जाना, पर एक विचार करना है।यह सब जब फिरसे शुरू होगा तो क्या में वैसे ही भागता रहूंगा जब तक कोई मुझे जबरदस्ती ना रोके?मुझे आज यह संकल्प करना है कि ३ महीने में एक बार, में अपने आपको रोकुंगा केवल ३ दिन के लिए और इसी तरह ज़िन्दगी बिताऊंगा जैसे पीछले १२ दिनों से गुजर रही है।मेरे लिए जो काम कर रहे है उन सबको छुट्टी दे दूंगा। मैं भी छुट्टी ले लूंगा और छत, परिवार, खाना और नींद - इनका आनंद लूंगा।१२ महीने भागना ही है तो १२ दिन तो रुक भी सकता हूं ना।
Monday, April 6, 2020
Wednesday, April 1, 2020
1. Run-Snatch-Run.
Run-Snatch-Run
Being an outdoor person, it gets challenging to stay home. Be
it fitness or conversations or anything that can be avoided indoors, I prefer
exteriors. I feel pepped up.
Few weeks back, I had been hearing of early morning incidences
of mobile-snatching on the service road parallel to Eastern Express highway,
which is my regular route for running and sun-facing work-outs.
Also, in my Cycling group on WhatsApp, there was a mention
by someone who had experienced it himself along the same route.
I did get a bit cautious but honestly, didn’t pay much attention.
I kept up with my scheduled regimes.
One day while running, I saw a police van in front of me.
Usually, there is one near the traffic light, but this was a different one and
at another location. As I approached the van, I saw the cop on the driver seat
gesturing to stop-by. I didn’t assume that it is for me, so I kept my pace on.
Once I got close, he slid his hand outside the window and asked me to stop.
I greeted him and the cop next to him. To my surprise, both
responded back. The police on the passenger seat conveyed me about the
incidents happening and asked me if I was aware of it. I mentioned that I have
heard of a few but honestly, haven’t bothered to dig further.
He requested me to run with mobile in the pocket. To which I
responded – Sir, I do not have a pocked in the running gear that I am wearing
today but from next time on, I shall ensure.
Both of them said – Dhyan
Rakho aur hume support karo (Take care and support us).
I bid adieu to them and the remainder of the stride left me
with a couple of thoughts –
· How nicely are they proactively alarming us at
the wee hours! Really appreciate.
· Those who are performing the act of snatching phones
at 5-6am in the morning, what kind of situation must they be going through? (Of course, I am not supporting them but
thoughts can come from anywhere)
I narrated this incident to one of my friends who travels
along for office. To her misfortune, in a couple of weeks, her iPhone was lifted
during her morning run!!
Monday, March 23, 2020
1. चलो, चलते है उस युग में...
चलो, चलते है उस युग में...
मैं उगाऊ चावल,
कोई दाल की करे खेती,
और, कोई सब्जी की फसल
किसी और से कहे भाई,
तू ऊगा थोड़े से फल,
दवाई के लिए हम,
जड़ीबूटी में खोजें हल
२ जोड़ी कपडे और छत,
क्यों चाहिए संदूक और महल,
चलो, चलते है उस युग में...
जहा सुख चैन से जीए हर पल ||
Friday, January 31, 2020
2. साल २०२०.
Jointly created by Suchit and Dilip.
जो गगन उड़ चली है पतंग जनवरी में,
कंदीलों से सजाना जब आए शिवरात्रि फरवरी में,
मार्च में धुलेटी का पक्का रंग चढ़ेगा इस बारी,
अप्रैल के पाड़वा में शुरू होगी नई पारी,
मई की गर्मी में दस्तक देगी रमज़ान,
जून आते देखेंगे जगन्नाथ यात्रा की शान,
भीगो देगी गुरु पूर्णिमा में जुलाई की बरखा,
अगस्त में पर्युषण न अन्य पर्व इसके सरखा,
सितम्बर करेगी गणेशजी को विदा,
नवरात्रि के नौ दिन अक्तूबर में फिदा,
नवम्बर में दीवाली का जश्न जलेंगे दीप,
दिसंबर की सर्दी में होंगे येशु के समीप,
बीत जाएगा साल ऐसा आनंद हर मास,
पर्वो की पवित्रता लेे जायेगी प्रभु के पास।
जो गगन उड़ चली है पतंग जनवरी में,
कंदीलों से सजाना जब आए शिवरात्रि फरवरी में,
मार्च में धुलेटी का पक्का रंग चढ़ेगा इस बारी,
अप्रैल के पाड़वा में शुरू होगी नई पारी,
मई की गर्मी में दस्तक देगी रमज़ान,
जून आते देखेंगे जगन्नाथ यात्रा की शान,
भीगो देगी गुरु पूर्णिमा में जुलाई की बरखा,
अगस्त में पर्युषण न अन्य पर्व इसके सरखा,
सितम्बर करेगी गणेशजी को विदा,
नवरात्रि के नौ दिन अक्तूबर में फिदा,
नवम्बर में दीवाली का जश्न जलेंगे दीप,
दिसंबर की सर्दी में होंगे येशु के समीप,
बीत जाएगा साल ऐसा आनंद हर मास,
पर्वो की पवित्रता लेे जायेगी प्रभु के पास।
Tuesday, January 21, 2020
1. ख्वाइश और रंजिश.
ना जितने की ख्वाइश,
ना हारने की रंजिश,
बहती नदी सा जीवन,
धुप सर्दी या फिर बारिश.
ना किसी से कोई गुज़ारिश,
ना कही करनी कुछ आज़माइश,
गिला शिकवे अब क्यों करने है,
जब वह कर रहा है परवरिश.
शरीर ने छू लिए चालीस,
फिर भी चल रही है मालिश,
बढ़ने के कोई आसार नहीं,
अब भी हो रही हरकतें बालिश.
ना हारने की रंजिश,
बहती नदी सा जीवन,
धुप सर्दी या फिर बारिश.
ना किसी से कोई गुज़ारिश,
ना कही करनी कुछ आज़माइश,
गिला शिकवे अब क्यों करने है,
जब वह कर रहा है परवरिश.
शरीर ने छू लिए चालीस,
फिर भी चल रही है मालिश,
बढ़ने के कोई आसार नहीं,
अब भी हो रही हरकतें बालिश.
Saturday, November 23, 2019
2. ये वक्त वक्त की बात है.
ये वक्त वक्त की बात है...
युद्ध के मैदान में,
मान रहा था वो बाप है,
मुंह की खाई उसने जब,
बेटे ने घोषित किया, वो सांप है...
ये वक्त वक्त की बात है...
बेटे ने फिर मिलाए सुर उनसे,
जो मैदान में परास्त है,
चलो हम मिलकर बाप को मारे,
यही आपसे दरख्वास्त है...
ये वक्त वक्त की बात है...
विरोधियों को मज़ा आया,
कमजोर होने पर भी किया शत्रु को मात है,
बाप ने रख दिया दाव पर सब कुछ,
विरोधियों से मिलकर, बेटे को किया साफ है...
ये वक्त वक्त की बात है...
निष्कर्ष...!!!
जो किसिके खिलाफ था,
आज उसी के साथ है,
जिसके सामने उंगली उठाई,
उसका थामा आज हाथ है...
ये वक्त वक्त की बात है...
युद्ध के मैदान में,
मान रहा था वो बाप है,
मुंह की खाई उसने जब,
बेटे ने घोषित किया, वो सांप है...
ये वक्त वक्त की बात है...
बेटे ने फिर मिलाए सुर उनसे,
जो मैदान में परास्त है,
चलो हम मिलकर बाप को मारे,
यही आपसे दरख्वास्त है...
ये वक्त वक्त की बात है...
विरोधियों को मज़ा आया,
कमजोर होने पर भी किया शत्रु को मात है,
बाप ने रख दिया दाव पर सब कुछ,
विरोधियों से मिलकर, बेटे को किया साफ है...
ये वक्त वक्त की बात है...
निष्कर्ष...!!!
जो किसिके खिलाफ था,
आज उसी के साथ है,
जिसके सामने उंगली उठाई,
उसका थामा आज हाथ है...
ये वक्त वक्त की बात है...
Friday, November 8, 2019
1. Umeed.
मंदिर का मन नहीं,
ना मस्ज़िद की ज़िद है,
प्यार, अमन, भाईचारा, कायम रहे,
बस इतनी सी उम्मीद है।
मस्ज़िद की ज़िद नहीं,
ना मंदिर का मन है,
प्रगति की ओर बढ़े कदम,
तो सफल मनुष्य जीवन है।
मंदिर का मन नहीं,
ना मस्ज़िद की ज़िद है,
एक स्कूल, एक अस्पताल बन जाए,
इस में ज़रूर, इंसानियत की जीत है।
मस्ज़िद की ज़िद नहीं,
ना मंदिर का मन है,
सब का मंगल और कल्याण हो,
ऊपरवाले ने सार्थक किया, यह वचन है।
ना मस्ज़िद की ज़िद है,
प्यार, अमन, भाईचारा, कायम रहे,
बस इतनी सी उम्मीद है।
मस्ज़िद की ज़िद नहीं,
ना मंदिर का मन है,
प्रगति की ओर बढ़े कदम,
तो सफल मनुष्य जीवन है।
मंदिर का मन नहीं,
ना मस्ज़िद की ज़िद है,
एक स्कूल, एक अस्पताल बन जाए,
इस में ज़रूर, इंसानियत की जीत है।
मस्ज़िद की ज़िद नहीं,
ना मंदिर का मन है,
सब का मंगल और कल्याण हो,
ऊपरवाले ने सार्थक किया, यह वचन है।
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